wood burning stove

 सर्दिया शुरू होते ही भारत के पहाड़ी क्षेत्रो हिमाचल, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर इत्यादि में लकड़ी से जलने वाले स्टोव या जिसे हिमाचल में बुखारी भी कहा जाता है (wood burning stove) का इस्तेमाल रसोई में या कमरे को गर्म करने के लिए किया जाता है इसके इलावा कई देशो में जंहा ठण्ड ज्यादा होती है और बर्फ गिरती है वहा इसका इस्तेमाल होता है।  

पहले लकड़ी से जलने वाले स्टोव (बुखारी ) को 1557 में औधोयोगिक क्रांति से दो शताब्दी पहले स्ट्रासबर्ग में पेटेंट कराया गया था और  धीरे -२ पूरी दुनिआ में इसका उपयोग होने लगा है।  
 इसे ज्यादातर कच्चे लोहे या सटील से बनाया जाता है इसमें के चैंबर के अंदर लकड़ी को जलाया जाता है और चिमनी की सहायता से धुआँ और जहरीली गैस को कमरे से बाहर भेजा जाता है लकड़ी के जलने से लोहे का चैंबर गर्म हो जाता है तथा उसकी गर्मी से कमरा गर्म हो जाता है, जहा से चिमनी का पाइप शुरू होता है वहा एक डैम्पर भी लगाया जाता है जिससे वायु परवाह को ज्यादा कम किया जाता है जिससे आग का जलना कम ज्यादा  है।  हिमाचल में सर्दी शुरू होते ही  आग से जलने वाले स्टोव के चारो परिवार के सदस्य बैठे जाते है और कमरा हंसी और बातो भर जाता है  इसतेमाल से ठण्ड बिलकुल ही दूर हो जाती है अब ये भी परिवार का एक अभिन्न अंग बन चूका है।  मगर जहा  इस्तेमाल से कुछ फायदे है  वहा इससे कुछ नुकसान भी है जिनके बारे में जाने भी बहुत जरूरी है।  

घुटने का दर्द 

 बुढ़ापे की बीमारी कहे जाने वाला घुटने का दर्द अब सामान्य उम्र के लोगो में भी देखा गया है, बुखारी के ज्यादा पास बैठने से इससे निकलने वाली गर्मी आपके घुटनो पर बहुत बुरा असर पड़ता है ये गर्मी घुटनो में मौजूद ग्रीस को सोख लेती है और चिकनाई खत्म हो जाती है जिससे आपको घुटनो के दर्द का सामना करना पड सकता है इसलिए इसके ज्यादा पास अधिक देर के लिए बिलकुल भी न बैठे अगर आप इसके पास ज्यादा देर तक बैठते है तो आज से ही ये आदत बदल दे और भविष्य में होने वाली परेशानियों से बचे।  

आँखों में नमी का कम होना 

  • दूसरी सबसे बड़ा नुकसान आँखों को होता है आँखे जिससे हम पूरी दुनिया को निहारते है हमारी आँखे बहुत ही अनमोल है बुखारी से निकलने वाली गर्मी से आँखों की नमी कम होने लगती है और सूखापन सा महसूस होने लगता है , फलस्वरूप आँखों में जलन होने लगती है।  

फेफड़ो की बीमारी, कैंसर 

  • यु तो लकड़ी के जलने से निकलने वाली जहरीली गैस और धुआँ चिमनी की सहायता से कमरे से बाहर चला जाता है मगर ये पूरी तरह कमरे से बाहर नहीं जाती इसकी कुछ मात्रा कमरे में ही रह जाती है जो के हमे दिखाई नहीं देती जो हमारे फेफड़ो और दिल के लिए बहुत हानिकारक होती है।  इसलिए कमरे को पूरी तरह से बंद नहीं करना चाहिए आक्सीजन के आने का भी उचित प्रबंध होना चाहिए।  

धन्यवाद् 

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